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Monday, September 7, 2009

कबीर के दोहे-संकट पड़ने पर दिखावटी भक्ति छूट जाती है (sankat aur bhakti-kabir ka dohe)

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं
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देखा देखी भक्ति का, कबहूँ न चढ़सी रंग
विपत्ति पडे यों छाड्सी, केचुली तजत भुजंग

संत शिरोमणी कबीरदास जी के अनुसार देखा-देखी की हुई भक्ति का रंग कभी भी आदमी पर नहीं चढ़ता और कभी उसके मन में स्थायी भाव नहीं बन पाता। जैसे ही कोई संकट या बाधा उत्पन्न होती है आदमी अपनी उस दिखावटी भक्ति को छोड़ देता है। वैसे ही जैसे समय आने पर सांप अपने शरीर से केंचुली का त्याग कर देता है।
वर्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग दूसरों को देख कर भगवान की भक्ति करते हैं। उनका अपना कोई इष्ट तो होता नहीं है और जो जैसा कहता है वैसी उसकी भक्ति करना लगते हैं। इससे उनको कोई लाभ नहीं होता। दूसरे के कहने से उसके इष्ट की पूजा करने से स्वयं को कोइ लाभ नहीं होता है। भक्ति से लाभ का आशय यह है की स्वयं के मन में हमेशा ही प्रसन्नता का भाव रहे और कभी किसी से डर न लगे या किसी बात की चिंता न हो। हमेशा मन प्रसन्न रहे यही है भक्ति का लाभ। कई बार ऐसा होता है कि पत्नी विवाह से पहले किसी इष्ट को मानती थी तो विवाह के बाद पति के इष्ट को ही मानने लगी। उसी तरह कहीं पति भी यही करता है। सच बात तो यह है कि बचपन से जिस इष्ट को पूजने की आदत बचपन से हो जाए उसे ही पूजना चाहिए। किसी दूसरे के कहने से इष्ट के स्वरूप को नहीं बदलना चाहिए। कहा जाता है की परमात्मा तो एक ही है उसके स्वरूप आलग हैं तो क्या? ऐसे में किसी को देखकर या कहने में आकर उसमें बदलाव करना इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य के मन में भक्ति का भाव नहीं है।
भक्त और ध्यान तो एकांत में किये जाते हैं। इससे उसी व्यक्ति के मन में शुद्धता और शान्ति होती है। दूसरे को दिखाकर या दूसरे को देखकर भक्ति करने से कोई लाभ नहीं है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, March 20, 2009

कबीर के दोहे: तोता चतुराई सीख कर पिंजरे में फंसा रहता है

चतुराई पोपट पढ़ी, पंडि़ सो पिंजर मांहि
फिर परमोधे और को, आपन समुझै नांहि

विद्वान लोग वेद पढ़ते हुए बहुत प्रकार का ज्ञान प्राप्त तो कर लेते हैं पर वह इतना भारी होता है कि उसे ढोना कठिन है। वह एक तरह से उनके लिये पिंंजरा बन जाता है जिसमें से निकलना उनके लिये संभव नहीं होता। धार्मिक ग्रंथ पढ़कर बहुत सारे लोग ज्ञानी कहलाते हैं पर दूसरों को तो उपदेश देते हैं पर स्वयं समझ नहीं पाते।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहते हैं कि भारत में शिक्षा का प्रसार हो रहा है पर दूसरा सच यह भी है कि अधिकतर लोग नौकरी-एक तरह से गुलामी-के लिये तैयार हो रहे हैं। शिक्षा प्राप्त करने के बाद वह अपने लिये किसी कंपनी या संस्थान का पिंजरा ढूंढते हैं जिसमें वह चैन से बैठ सकें। जब मालिक या बोस अनुमति दे-अवकाश स्वीकृत करे-तभी वह उड़कर इस दुनियां का आनंद लें फिर अपने पिंजरे में फिर वापस लौट आयें-वैसे ही जैसे तोता अपने पिंजरे में लौट आता है।
बहुत सारे ज्ञानी तो हम देख सकते हैं। पंडालों में हजारों की भीड़ बैठी रहती है और कथित ज्ञानी अपने प्रवचन देते हुए लोगों को मोह माया से दूर रहने का संदेश देते हैं। कार्यक्रम समाप्त होने से पहले फिर लोगों से दान का आग्रह जरूर करते हुए यह जरूर कहते हैं कि ‘धन के बिना आजकल कोई काम नहीं होता। इसलिये अपना पैसा प्रदान अवश्य करें कि धर्म का प्रचार कर सकें।’
इस तरह अनेक कथित ज्ञानियों ने पंचसितारा आश्रम बना लिये हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि धमग्रंथों का अध्ययन उन लोगों ने किया होता है। उनके प्रवचनों से यह प्रमाणित भी होता है पर वह भी उसी अज्ञान के पिंजरे में बंदी लगते हैं जिसमें सामान्य आदमी के होने का आभास हमेशा होता है। धर्म प्रचार के लिये संलग्न ऐसे लोग यह नहीं जानते कि वह स्वयं ही एक पिंजरे में कैद हैं।
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