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Friday, July 29, 2011

चाणक्य नीति-नकारा लोग दूसरों की आलोचना करते हैं

         मनुष्य का धर्म है कि वह अपना कर्म निरंतर करता रहे। अपनी वाणी और विचार पर नियंत्रण रखे। भगवान का स्मरण करते हुए अपनी जीवन यात्रा सहजता से पूर्ण करे। जहां तक हो सके अपने ही काम से काम रखे न कि दूसरों को देखकर ईर्ष्या करे। आमतौर से इस विश्व में लोग शांति प्रिय ही होते हैं इसलिये ही मानव सभ्यता बची हुई। यह अलग बात है कि शांत और निष्कर्मी मनुष्य की सक्रियता अधिक दिखती नहीं है इसलिये उसकी चर्चा सार्वजनिक रूप से नहीं होती जबकि अशांति, दुष्टता और परनिंदा में लगे लोगों की सक्रियता अधिक दिखती है इसलिये आमजन उस पर चर्चा करते हैं।
     हम लोग परनिंदकों की बातें सुनकर मजे लेते हैं जबकि दूसरों की तरक्की से ईर्ष्या के साथ उसकी निंदा करने वालों की बातें सुनना भी अपराध है। ऐसे लोग पीठ पीछे किसी आदमी की निंदा कर सामने मौजूद आदमी को प्रसन्न अवश्य करते हैं पर सुनने वाले को यह भी सोचना चाहिए कि उसके पीछे वही आदमी उसकी भी निंदा कर सकता है।
       आचार्य चाणक्य कहते हैं कि
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       दह्यमानाः सुतीत्रेण नीचा पर-यशोऽगिना।
           अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकृर्वते।।
     ‘‘दुर्जन आदमी दूसरों की कीर्ति देखकर उससे ईर्ष्या करता है और जक स्वयं उन्नति नहीं कर पाता तो प्रगतिशील आदमी की निंदा करने लगता है।’’
       यदीच्छसि वशीकर्तु जगदकेन कर्मणा।
            परापवादस्सयेभ्यो गां चरंतीं निवारथ।।
       ‘‘यदि कोई व्यक्ति चाहता है कि वह समस्त संसार को अपने वश में करे तो उसे दूसरों की निंदा करना बंद कर देना चाहिए। अपनी जीभ को वश में करने वाला ही अपना प्रभाव समाज पर रखता है।
           इस संसार में कुछ लोग ऐसे भी दिखते हैं जिनका उद्देश्य अपना काम करने अधिक दूसरे का काम बिगाड़ना होता है। सकारात्मक विचाराधारा से अधिक उनको नकारात्मक कार्य में संलिप्त होना अधिक अच्छा लगता है। रचना से अधिक विध्वंस में उनको आनंद आता है। अंततः वह अपने लिये हानिदायक तो होते हैं कालांतर में अपने सहयेागी की भी लुटिया डुबो देते हैं।
        जो लोग सोचते हैं कि उनको समाज में सम्मान प्राप्त हो उनके लिये यह जरूरी है कि वह अपनी ऐसी संगत बदल दें जिसके साथ रहने पर लोग उनसे भी हानि होने की आशंका से ग्रस्त रहते हैं। यह भय सम्मान दिलाने में सबसे अधिक बाधक है। इसके अलावा किसी की निंदा तो बिल्कुल न करें क्योंकि अगर किसी आदमी के सामने आप अन्य की पीठ पीछे निंदा करते हैं तो सामने वाले के मन में यह संशय भी आ सकता है कि बाद में आप उसकी भी निंदा करे। इससे विश्वास कम होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Wednesday, June 15, 2011

हिन्दी चाणक्य नीति-अन्न, जल और मधुर वाणी रत्न के समान (hindi chankya neeti-anna, jal aur madhur wani ratna ke saman)

      देखा जाये तो हमें प्रकृति का आभारी होना चाहिए जिसने हमारे देश को खनिज, कृषि तथा जलवायु की दृष्टि से संपन्न होता है। प्रकृति विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में भूगर्भ जलस्तर अन्य देशों की अपेक्षा सबसे कम नीचे मिलता है। मतलब हमारे यहां जलस्त्रोत सहजता से उपलब्ध हैं। इस बात को समझने की बजाय  आधुनिक प्रचार माध्यमों के विज्ञापनों से पूरा भारतीय समाज दिग्भ्रमित हो रहा है। क्रिकेट खिलाड़ियों, फिल्म अभिनेता तथा अभिनेत्रियों के अभिनीत विज्ञापन उपभोग की ऐसी खतरनाक प्रवृत्ति को जाग्रत करते हैं कि लोगों की अध्यात्मिक चेतना लुप्त हो गयी है। फिर हमारी शिक्षा व्यवस्था में ऐसी प्रणाली अपनाई गयी है जो केवल गुलाम बनाती है। ऐसे में अगर किसी में रचनात्मक प्रवृत्ति जाग्रत हो जाये तो वह पूर्व जन्म का ही प्रभाव समझे तो अच्छा है वरना तो    अब व्यक्ति में चरित्र निर्माण की बजाय उसे प्रयोक्ता और सेवक बनने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
       वैसे समाज की हालत तो कोई पहले भी अच्छी नहीं थी। सोना, चांदी, हीरा और रत्नों की चाहत हमारे समाज में हमेशा रही है। शायद यही कारण है कि हमारे मनीषी मनुष्य के अंदर मौजूद उस रत्न का परिचय कराते रहे हैं जिसे आत्मा कहा जाता है। इसके बावजूद लोग भौतिक संसार की चकाचौंध में खो जाते हैं और सोना, चांदी और हीरे की चाहत में ऐसे दौड़ते हैं कि पूरा जीवन ही अध्यात्मिक ज्ञान के बिना गुजार देते हैं। जिस अन्न और जल से जीवन मिलता है उसे तुच्छ समझते हैं एक पल का चैन न दे वही सोना गले लगा देते हैं। उसी तरह देहाभिमान से युक्त होने के कारण अधिक वाचाल होकर क्रूरतम शब्दों का प्रयोग करते हैं। जिससे समाज में वैमनस्य बढ़ता है।
           महान नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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          पृथिव्यां त्रीणी रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
             मूर्खे पाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।
         ‘‘इस प्रथ्वी पर तीन ही रत्न हैं-अन्न, जल और मधुर वाणी, किन्तु मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न कहते हैं।’’
       अक्सर लोग कहते हैं कि भारतीय लोगों के पास दुनियां के अन्य देशों के मुकाबले बहुत अधिक सोना है, मगर बहुत कम लोग जानते हैं कि उससे अधिक तो हम पर परमात्मा की यह कृपा है कि दुनियां के अन्य देशों से अधिक हमारे यहां भूगर्भ जलस्तर के साथ अन्य प्रकृति संपदा भी बड़े पैमाने पर उपलब्ध है।  वैसे आजकल बाज़ार के सौदागर यह प्रयास भी कर रहे हैं कि यहां जल सूख जाये और उसे बेचकर अपने बैंक खाते बढ़ायें। अनेक तरह के ठंडे पेयों के कारखाने यहां स्थापित हो गये हैं जो अपने इलाके का पूरा जल पी जाते हैं। वहां का जलस्तर कम हो गया है पर भारतीय जनमानस ऐसी चकाचौंध में खो गया है कि उसे इसका आभास ही नहीं होता। जल जैसा रत्न हम खोते जा रहे हैं पर आर्थिक विकास का मोह ऐसा अंधा किये जा रहा है कि उसकी परवाह नहीं है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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