समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Showing posts with label Patanjaliyoga. Show all posts
Showing posts with label Patanjaliyoga. Show all posts

Thursday, September 15, 2016

योग जब माया उत्पादन का उद्योग बन जाये-पतंजलि योग दर्शन विक्रय योग नहीं (Than yoga made a Industry-A Article on Patanjaliyoga

भारतीय दर्शन के अनुसार देवी सरस्वती तथा देवी लक्ष्मी का बैर है। वह दोनों एक जगह एक साथ नहीं रहती। इसे कोई अंधविश्वास कहे या विश्वास पर हमारी नज़र से यह एक प्रकृति सिद्धांत है कि जिनके पास ज्ञान बुद्धि अधिक है वह माया का संग्रह अधिक नहीं करते हैें और जो करते हैं भले ही ज्ञान के विक्रेता हों पर बुद्धि के खजांची नहीं हो सकते।
हमारे देश के प्राचीन ग्रंथों की सरस कथायेंए महान ऋषितुल्य लेखकों की पवित्र रचनायें तथा धार्मिक नायकों की भूमिकायें अध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार के लिये महान संदर्भ का कार्य करती हैं। हमारा योग साहित्य तथा श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान इतना सरस है कि जितना पढ़ो उतनी ही जिज्ञासा बढ़ती जाती है। शर्त यही है कि सुनकर गुनो और पढ़कर समझो। बौद्धिक अनुसंधान कर अपने चिंत्तन से से निष्कर्ष निकालो। मगर पेशेवरों ने ऐसा जादू इस समाज पर किया है कि वह ग्रंथों का रटकर गुरु पदवी धारण करते हुए शिष्य संग्रह दक्षिणा की राशि के लिये करने मे लगे रहते है। कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय दर्शन विश्व में सबसे श्रेष्ठ व पूर्ण है। मजे की बात यह है कि भारतीय ज्ञान का विक्रय ही सबसे ज्यादा होता है। ज्ञान की पुस्तकें रटकर काम क्रोध तथा मोह त्यागने का नारे लगाने वाले मायापति हो जाते हैं। जिस तरह कलाए साहित्यए फिल्म तथा पत्रकारिता के शीर्ष पुरुष अपनी छवि के नकदीकरण के लिये समाजसेवा में आते हैं उसी तरह धार्मिक शिखरों के स्वामी भी नकदीकरण के मोह से नहीं बच पाते। इस प्रयास में उनकी छवि का रूप बदलता है इसका अहसास तक उनको नहीं होता। अनेक बुद्धिमान जन इनके प्रति अपनी धारणा बदलने लगते हैं.यह अलग बात है कि उनको पता नहीं होता।
सरस्वती पुत्र लक्ष्मीपति होकर भी इतराते हैं पर यह ज्ञान साधक वह सिद्ध जानते हैं कि इन देवियों का बैर अत्यंत वैज्ञानिक सिद्धांत है जिसे बदलने की क्षमता बड़े से बड़े योगी में नहीं होती।
================================================
नोट.कृपया इसे किसी परम सिद्ध योगचार्य तथा उसके प्रबंधक से न जोड़ें जो कभी योग के स्तंभ माने जाते थे और अब उनके उद्योग प्रबंधन तथा की संग्रहीत माया की चर्चा होने लगी है। योगाचार्य की छवि बदल कर उद्योगपति जैसे उनका प्रचार हो रहा है। हमने उनकी प्रशंसा में अपने ब्लॉग पर अनेक पाठ डाले जिसके लिये आलोचनात्मक टिप्पणियां भी झेलनी पड़ी। स्थिति यह है कि योग के प्रवर्तक महर्षि पतंजलि अब दवाओं के प्रचार नायक बना दिये गये हैं। टीवी पर पतंजलि का नाम जोड़कर दिखाये जा रहे विज्ञापनों यह अहसास होने लगा है कि अभी तक ज्ञान ही विक्रय योग्य था पर योग तो उससे अधिक दाम दिलाने वाला विषय बन गया है। बहरहाल उन दोनों की आलोचना करना उद्देश्य नहीं है पर अगर कोई करता है तो हम उसके जिम्मेदार नहीं है।

Thursday, March 24, 2016

पेशेवर पहलवान क्या जाने योगफल का स्वाद (Peshewar Pahalwan Kya jane Yogafal ka Swad)

हमारे देश के अध्यात्मिक दर्शन का मूल तत्व योग साधना है। इसके आठभाग है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं पर इसके बावजूद अनेक अल्पज्ञानी इस पर गाहबगाहे टिप्पणियां करने लग जाते हैं। लोकतंत्र में वाणी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है। यह ठीक भी है पर इसमें अब समस्या यह हो गयी है कि चाहे जो कुछ बोलने लगता है।  अनेक लोग प्रतिष्ठा के मद में इतने लिप्त हो जाते हैं कि अपने सर्वज्ञानी होने का भ्रम उनको हो जाता है। वह ऐसे विषयों पर भी बोल जाते हैं जिनके शास्त्र का अध्ययन उन्होंने नहीं किया होता वरन् इधर उधर से सुनकर अपनी राय बनाकर शब्द फैक देते हैं।  एक पेशेवर नकली पहलवान ने कह दिया कि ‘आलसी व बीमार लोग योग साधना करते हैं। ताकतवर को इसकी जरूरत नहीं है।’
वैसे एक ऐसे योगाचार्य को लक्ष्य कर उसने अपनी बात कही जिन्होंने वास्तव में योग साधना का समाज में बहुत प्रचार किया है पर उनकी वजह से ही अनेक लोग इसे शारीरिक व्यायाम समझने लगे हैं-एक तरह से जहां योग साधना प्रचार तो किया पर उससे साधकों को सीमित लक्ष्य तक ही रहने के लिये प्रेरित किया। देखा जाये तो पेशेवर पहलवान से एक पेशेवर योगाचार्य समाज के लिये अधिक बेहतर है-कम से कम अपने उसकी तरह महानायक होने का भ्रम तो नहीं पैदा करता।  बहरहाल पेशेवर पहलवान के बारे में कहा जाता है कि वह तयशुदा मुकाबले लड़ता है-मुक्केबाजी व कुश्ती खेल में इस तरह की चर्चा रहती है कि परिणाम न केवल तयशुदा होते हैं वरन् प्रहार भी दिखावटी होते हैं। अलबत्ता उसने पैसा व प्रचार खूब कमाया है जिससे उसके दिमाग में अपने  ज्ञानी होने का भ्रम होना स्वाभाविक है। उसे अब कौन समझाये कि योग के आठ भाग होते हैं जिनमें से गुजरने की आलसी सोच भी नहीं सकते और बीमारों के यह बस का नहीं होता। बीमारी भी देह की नहीं वरन् मन तथा विचार की भी होती है।
               आजकल आत्ममुग्धता की यह बीमारी पूरे समाज में फैल रही है कि  किसी भी विषय की किताब पढ़ने की बजाय उसका नाम पढ़कर ही लोग यह मानते हैं कि कि उन्हें ज्ञान हो गया। उर्दू की शायरी ने सभी लोग में यह अहंकार भर दिया है कि ‘खत का मजमून जान लेते हैं लिफाफा देखकर’। कथित नकली पर प्रसिद्ध पहलवान के बारे में हम  बस इतना ही कह सकते हैं कि वह स्वतः योग शास्त्र का अध्ययन करे फिर टिप्पणी करे।
-------------------

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

अध्यात्मिक पत्रिकाएं