समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Showing posts with label AHinduReligion Thought. Show all posts
Showing posts with label AHinduReligion Thought. Show all posts

Wednesday, June 27, 2018

पश्चिमी दबाव में धर्म और नाम बदलने वाले धर्मनिरपेक्षता का नाटक करते रहेंगे-हिन्दी लेख (Convrted Hindu Now will Drama As Secularism Presure of West society-Hindi Article on Conversion of Religion)

        
                           हम पुराने भक्त हैं। चिंत्तक भी हैं। भक्तों का राजनीतिक तथा कथित सामाजिक संगठन के लोगों से संपर्क रहा है। यह अलग बात है कि उन्होंने हमें धास भी नहीं डाली पर जानते हैं कि हमारा चिंत्तन हमेशा स्वतंत्र तथा तार्किक विचाराधारा वाला रहा है।  सो बता बता देते हैं कि भारत में हिन्दू धर्म छोड़ने वालों ने विदेशियों के दबाव में ही छोड़ा था ताकि वहां काम, नाम तथा नामा मिल सके।  हिन्दू धर्म का विरोध यूरोप में रहा है पर वही यूरोप अब हिन्दू धर्म के योग को अपना रहा है।  दूसरा वहां हिन्दू धर्म छोड़ने वालों को प्रगतिशील माना गया सो। याद रखें भारतीय उपमहाद्वीप आज नहीं बरसों से ही श्रम निर्यातक रहा है। प्राचीन काल में गये लोगों ने धर्म नहीं छोड़ा पर आधुनिक काल में यह नीति बन गयी कि हिन्दूधर्म छोड़ो और विकसित कहलाओ।
अ ब यूरोप सहित पश्चिमी देशों में स्थिति उलट हो रही है।  आधुनिक वह धर्मनिरपेक्ष दिखने वाले धर्म तो छोड़ गये। अरेबिक देशों से होते हुए यूरोप तथा अन्य पश्चिमी देशों में घूमते भी रहे पर वहां अब अरेबिक धर्म से पश्चिमी धर्म के लोग चिढ़ने लगे हैं। पहले लोगों को धर्म बदलकर अरेबिक नाम की ज्ररूरत थी अब उन्हें ही हिन्दी नाम की चाहत भी हो सकती है। हिन्दी नाम अब ज्ञान तथा विज्ञान दोनों की पहचान बन गयी है। सीधी बात कहें तो हिन्दू धर्म के मूल ज्ञान तथा विज्ञान का विस्तार अब पश्चिम से होता हुआ यहां आयेगा।  सो धर्मनिरपेक्ष तथा विकासित दिखने वाले लोग प्रयास यही करेंगे कि भक्तों की मानसिकता अस्थित करो। हमारी सलाह है  कि बात को घुमाने की बजाय सीधे कहो कि हम हिन्दू हैं और हमारी विचाराधारा अकेले ऐसी है जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान हैं।  हमारे परमात्मा  के रूपों तथा पूजा में भिन्नता एक स्वाभाविक शैली है जो मनुष्य मन को सदैव संचालित रखती है।  हम सात दिन में सात रूप पूजते हैं न कि एक दिन विशेष एक ही प्रकार की दरबार जायें। 
                  आखिरी बात यह है कि हमने देखा है कि मूर्ति पूजने तथा माथे पर टीका लगाने वाले पुरुष तथा बिन्दी लगाने वाली महिलाओं के चेहरे पर एक विशेष प्रकार का आकर्षण होता है। उनके चेहरे पर एक स्वाभाविक मुस्कान खेलती दिखती है। जो मूर्ति पूजा या घर में ध्यान वगैरह नहीं करते उनके चेहरे हमे फक लगते हैं। कितना भी चेहरा चमका लें वह रूखा  ही लगता है। एकदम मुस्कानहीन। कभी कभी हम टीवी पर धर्म परिवर्तित लोगों का चेहरा देखते हैं ऐसा लगता है कि रो रहे हैं। याद रखें हिन्दू मान्यता के अनुसार भक्त चार प्रकार के होते हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  जबकि दूसरी मान्यताओं में केवल आर्त भाव की प्रधानता है।  
--
            आजकल हम वृंदावन रहने लगे हैं। रेलों में घूमते रहते हैं। आज ग्वालियर वापस लौटे। सोचा कोई बड़ा चिंत्तन लिखो। वृंदावन में भक्त जब आते हैं तो उनका भाव देखते ही बनता है। बाकेबिहारी तथा अंग्रेजों के मंदिर में श्रद्धालू जिस भाव से आते हैं उसका वर्णन शब्दों में कठिन है। प्रेम मंदिर पर तो इतनी भीड़ रहती है कि हमें संदेह होता है कि ताजमहल पर भी इतनी होती होगी।  जो एक वहां जायेगा वह ताजमहल में मृतभाव का अनुभव करेगा। वहां कितने अंग्रेज कृष्ण के भक्त हैं कहना कठिन है उनकी संख्या इतनी है कि वह रास्ते पर मिलते ही रहते हैं।

Wednesday, April 20, 2016

पराधीनता सबसे बड़ा दुःख-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(Paradhinta sabse Badh dukhg-A Hindi thought based on ManuSmriti)


15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। 26 जनवरी 1950 को अपना स्वदेशी संविधान भी बना पर राज्य व शैक्षणिक प्रणाली यथावत रही। इसी कारण देश में एक नवपरतंत्र जीवन शैली का भी विकसित हुई इसका सबसे बड़ा प्रभाव नवशिक्षितों पर पड़ा। लोगों के निजी व्यवसाय में अपना पसीना बहाकर कमाने की प्रवृत्ति की बजाय नौकरी कर सभ्रांत दिखने की ऐसी प्रवृत्ति बढ़ी कि देश बेरोजगारी के ऐसे भंवर में फंसा कि अभी तक निकल नहीं पाया। हमारे यहां कहावत है कि ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ पर अब उसकी जगह कहा जाने लगा है कि ‘अपना हाथ कर्ज के साथ’। स्थिति यह हो गयी है कि नौकरी पेशा लोग कर्ज लेकर वाहन वह मकान बड़ी शान से बना रहे हैं।  बाहर से विकसित दिखने वाला समाज अंदर से कितना खोखला है इसका अध्ययन करना चाहिये।
मनुस्मृत्ति में कहा गया है कि
--------------
सर्व परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्
एतद्विद्यातसमासेन लक्षणं सुखदंःखयोः।
हिन्दी में भावार्थ-किसी मनुष्य का कार्य दूसरे के अधीन है तो वह दुःख है। अपने अधीन कार्य का होना ही सुख है। यही सुखःदुःख का लक्षण है।
किसी भी राष्ट्र को तभी विकसित व शक्तिशाली माना जाता है जिसका समाज ठोस मुद्रा  से सराबोर होता है। तरल मुद्रा की बहुलता कभी भी संपन्नता का प्रमाण नहीं मानी जाती क्योंकि उसका प्रवाह एक से दूसरे हाथ की तरफ होता है। आज हम देखें तो देश में अधिकतर लोगों के जीवन का आधार ही परजीवी हो गया है। ऐसे में किसी बड़े अभियान की सफलता की सोचना ही गलत है। इतना ही नहीं लोग भले ही एक दूसरे को आपातकाल में सहायता की मदद का वादा करें पर उनमें उसे निभाने की क्षमता संदिग्ध होती है।  अगर हम चाहते है कि हमारा समाज दृढ़ हो तो ऐसी आर्थिक प्रणाली अपनानी होगी जिससे लोग आत्मनिर्भर हों न कि कर्ज चुकाने में संघर्षरत रहें।
------------------
दीपक  राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

अध्यात्मिक पत्रिकाएं