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Thursday, August 2, 2012

ऋग्वेद से सन्देश-मन को प्रसन्न करने वाले काम करें (man ko prasanna karne wale kaam karen-rigved se sandesh)

             सामान्य मनुष्य अनेक बार परिवार, मित्र तथा समाज के दबाव में अनेक बार ऐसे कार्य करते हैं जिससे उनका स्वयं का मन उद्विग्न हो उठता है। इसके विपरीत ज्ञानी हमेशा ही अपने मन को प्रसन्न करने वाले ही कर्म करते हैं। यह बात हम धार्मिक कर्मकांडों अवसर पर देख सकते हैं जब परिवार, समाज तथा मित्रों के दबाव में आदमी उनका निर्वाह करता है यह जानते हुए भी यह ढकोसला है। खासतौर से विवाह, गमी तथा अन्य कार्यक्रमों के समय दिखावे के लिये ऐसे अनेक कर्मकांड रचे गये हैं जिनको केवल दिखावे के लिये ही धर्म का प्रतीक माना जाता है। हमारे अनेक महान विद्वानों ने धार्मिक कर्मकांडों तथा अध्यात्मिक ज्ञान के अंतर को स्पष्ट किया है। यह अलग बात है कि समाज में उनका नाम को सम्मान दिया जाता है पर उनके संदेश कोई नहीं मानता। यही कारण है कि जब किसी के घर में शादी या गमी का अवसर आता है तो वह अपना सुख दुःख भूलकर केवल अपनी जिम्मेदारी निभाने का तनाव झेलता है। उसके मन में यही ख्याल आता है कि ‘अगर मैंने यह नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे’। यही सोचकर हम ऐसे काम भी करते हैं जो मन को प्रसन्न करने की बजाय तनाव के तरफ धकेलते हैं।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
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श्रिय मनांसि देवासो अक्रन्
‘‘ज्ञानी निज अपने हृदय को प्रसन्न करने वाले कर्म करते हैं।’’
सुवीर्यस्य पतयः स्याम।
‘‘हम उत्तम बल के स्वामी बनें।’’
       अगर मनुष्य चाहे तो स्वयं को योगसाधना तथा अध्यात्मिक ग्रंथों के अध्ययन से मानसिक रूप से दृढ़ होने के साथ ही दैहिक रूप से बलवान भी बना सकता है। हमारे हिन्दू धर्म की पहचान उसके कर्मकांडों से नहीं वरन् उसमें वर्णित तत्वज्ञान से है जिसका लोह आज पूरा विश्व मानता है। अगर हम अपने अंदर कर्मकांडों के निर्वहन का तनाव पालेंगे तो कभी शक्तिशाली नहीं बन सकते। जहां धर्म से कुछ पाने का मोह है वहां सिवाय तनाव के कुछ नहीं आता। मन में धर्म के प्रति त्याग का भाव हो तो स्वतः मन स्फूर्त हो जाता है। इस त्याग को भाव को तभी समझा जा सकता है जब हम परोपकार, ज्ञान संग्रह तथा हृदय से भगवान की भक्ति करेंगे।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Tuesday, April 26, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-जहर फैलाने वालों की प्रशंसा न करें (jahar failane valon kee prashansa na karen-bhratrihari niti shatak)

                   उच्च पदस्थ, धनवानों तथा बलिष्ठ लोगों को समाज में सम्मान से देखा जाता है और इसलिये उनसे मित्रता करने की होड़ लगी रहती है। जब समाज में सब कुछ सहज ढंग से चलता था तो जीवन के उतार चढ़ाव के साथ लोगों का स्तर ऊपर और नीचे होता था फिर भी अपने व्यवहार से लोगों का दिल जीतने वाले लोग अपने भौतिक पतन के बावजूद सम्मान पाते थे। बढ़ती आबादी के साथ राज्य करने के तौर तरीके बदले। समाज में राज्य का हस्तक्षेप इतना बढ़ा गया कि अर्थ, राजनीति तथा सांस्कृतिक क्षेत्र में राजनीति का दबाव काम करने लगा है। इससे समाज में लोकप्रियता दिलाने वाले क्षेत्रों में राज्य के माध्यम से सफलता पाने के संक्षिप्त मार्ग चुनने की प्रक्रिया लोग अपनाने लगे। स्थिति यह हो गयी है कि योग्यता न होने के बावजूद केवल जुगाड़ के दम पर समाज में लोकप्रियता प्राप्त कर लेते हैं। दुष्ट लोग जनकल्याण का कार्य करने लगे है। हालत यह हो गयी है कि दुष्टता और सज्जनता के बीच पतला अंतर रह गया है जिसे समझना कठिन है। व्यक्तिगत जीवन में झांकना निजी स्वतंत्रा में हस्तक्षेप माना जाता है पर सच यही है कि जिनका आचरण भ्रष्ट है वही आजकल उत्कृष्ट स्थानों पर विराजमान हो गये है। उनसे समाज का भला हो सकने की आशा करना स्वयं को ही धोखा देना है।
                   इस विषय में भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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               आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्।
             दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
              "जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।"
               दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्।
               मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
"इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी हो तो उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।"
           कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विद्वता के शिखर पर भी वही लोग विराजमान हो गये हैें जो इधर उधर के विचार पढ़कर अपनी जुबां से सभाओं में सुनाते हैं। कुछ तो विदेशी किताबों के अनुवाद कर अपने विचार इस तरह व्यक्त करते हैं जैसे कि उनका अनुवादक होना ही उनकी विद्वता का प्रमाण है। उनके चाटुकार वाह वाह करते हैं। परिणाम यह हुआ है कि अब लोग कहने लगे हैं कि शैक्षणिक, साहित्यक तथा धार्मिक क्षेत्रों में अब नया चिंतन तो हो नहीं रहा उल्टे लोग अध्ययन और मनन की प्रक्रिया से ही परे हो रहे हैं। जैसे गुरु होंगे वैसे ही तो उनके शिष्य होंगे। शिक्षा देने वालों के पास अपना चिंतन नहीं है और जो उनकी संगत करते हैं उनको भी रटने की आदत हो जाती है। ज्ञान की बात सभी करते हैं पर व्यवहार में लाना तो विरलों के लिऐ ही संभव हो गया है।
            अब तो यह हालत हो गयी है की अनेक लोगों को मिलने वाले पुरस्कारों पर ही लोग हंसते हैं। जिनको समाज के लिये अमृतमय बताया जाता है उनके व्यवसाय ही विष बेचना है। सम्मानित होने से वह कोई अमृत सृजक नहीं बन जाते। इससे हमारे समाज की विश्व में स्थिति तो खराब होती है युवाओं में गलत संदेश जाता है। फिल्मों में ऐसे गीतों को नंबर बताकर उनको इनाम दिये जाते हैं जिनका घर में गाना ही अपराध जैसा लगता है। फिल्म और टीवी में माध्यम से समाज में विष अमृत कर बेचा जा रहा है। ऐसे में भारतीय अध्यात्म दर्शन से ही यह आशा रह जाती है क्योंकि वह समाज में ज्ञान का प्रकाश फैलाये रहता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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