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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Wednesday, November 23, 2016

नोटबंदी से किसानों, मजदूरों और महिलाओं को नकली मुद्रा के खौफ से अभी तो मुक्ति मिलेगी-हिन्दी संपादकीय (formers, Lebour and Woman free Fake Currency from DeModitisation-hindi editorial)


                                 नोटबंदी पर हमारा नजरिया सबसे अलग रहा है।  मजे की बात यह कि जिस किसान, मजदूर और गरीब की दुर्दशा पर नोटबंदी के विरोधी आंसु बहा रहे हैं उसी के खोये मनोबल की वापसी की आशा में समर्थन कर रहे हैं।
                                                एक बार हम बिजलीघर गये थे तो एक निम्न मध्यमवर्गीय अशिक्षित महिला पांच सौ का नोट दिखाकर बोली‘-साहब हमारा यह नोट देखना नकली तो नहीं है। बड़ा डर लगता है क्योंकि इसका नंबर बिल के पीछे लिखाकर लाई हूं।
                        हमने कहा-‘सच बात तो यह है कि हमें भी समझ  नहीं है। फिर भी देख लेते हैं।
                         पास में ही एक सज्जन खड़े थे उन्होंने कहालाओ मैं देखता हूं।
                          उन्होंने देखा और फिर कहा-‘यह असली है।
                        पानी और बिजली के बिलों पर पांच सौ और हजार के नोटों का नंबर लिखकर देना एकदम सामान्य बात लगती है पर हमें अपने ही देश की मुद्रा के प्रति ऐसा अविश्वास हमारा ही मनोबल गिराता है।  बिल जमा कर घर वापस आने पर भी चिंता सताती थी कि कहीं वहां नकली नोट निकलने की सूचना जाये।
                         हम जब किसी को पांच सौ या हजार का नोट देते थे तो वह उलट पलट कर देखता था तो हम कहते थे किभई, यह नोट हम एटीएम से निकाल कर लाये हैं।
                           सीधा जवाब मिलता किएटीएम से भी नकली नोट निकलते हैं।
                                एक आदमी तो हमसे कह रहा था कि बैंकों की गड्डी जो एटीएम में डाली जाती है उसमें सौ में चार नकली होते हैं।  हमारे एक दोस्त ने बताया कि उसे एटीएम से पांच सौ के नोट निकालकर अपने किसी जीवन बीमा एजेंट के पास देने गया तो उसने बताया कि दो नोट नकली है।  उस मित्र ने जैसे तैसे उनको कहीं चला दिया।  एक मित्र ने बताया कि उसने सीधे बैंक से हजार के पांच नोट निकाले और जीवन बीमा कार्यालय में जमा कराने गया।  वहां उसे दो नोट नकली बताकर वापस किये गये। वह बैंक आया तो रोकड़िया ने साफ मना कर दिया कि उसने दिये हैं। यह तो गनीमत थी कि इस गतिविधि के दौरान दो अन्य साथी भी थे। उन्होंने  पुलिस मेें रिपोर्ट लिखाने बात कही तो शायद बात बन गयी थी।
                          इस नकली मुद्रा का प्रकोप इतना था कि हमारे एक मित्र को कहीं से किसी ने 25 हजार कर्ज की वापसी में 5 सौ और हजार के नोट दिये थे। हमने उससे कहा कि-‘तुम इनको बैंक में जमा क्यों नहीं करते?’
                               उसने कहा-‘मैं पागल नहीं हूं। बैंक में कहीं इसमें से कोई नकली निकला तो परेशानी हो सकती है। मैं तो इन्हें घर खर्च में लूंगा।
                                    उस दिन बैंक में पासबुक पर एंट्री कराने गये तो वहां एक अर्द्धशिक्षित वह निम्न मध्यमवर्गीय लड़का हजार के चार नोट पास लाकर बोला-‘सर, आप चेक कर दें इनमें से कोई नकली तो नहीं है।
                                               मैंने उससे कहा कितुम कैशियर के पास जाओ। वह बता देगा।
                                                उसने कहा-‘सर, अगर नकली हुआ तो वह कहीं पुलिस को बुला ले।
                                       हमने उससे कहा-‘तुम यहां किसी दूसरे को दिखा दो मुझे इसका ज्यादा अनुमान नहीं है।
                        एक नहीं ऐसी अनेक घटनायें हुईं जिसमें किसान, मजदूर और महिलाओं को नकली नोटों से भयभीत देखा-सभी घटनाओं का वर्णन करना बेकार है। इन घटनाओं ने हमारे अंदर देश की मुद्रा के प्रति अविश्वास भर दिया था।  एटीएम से निकले हजार या पांच सौ के नोट पहले खर्च करते थे। जेब में सौ के पांच नोट हो तो भी हम पेट्रोल पंप या अन्य कहीं दो सौ के भुगतान के लिये पांच सौ या हजार का नोट पहले देते थे।  हमार सारे भुगतान बैंक में ही आते थे इसलिये कहीं से नकली मुद्रा प्राप्त होने की आशंका नहीं थी। अगर कहीं हजार का नोट देने पर पांच सौ का नोट मिलता था तो चिंता हो जाती थी कि यह असली है या नहीं।
                        कभी अपने हाथ से बैंक या पोस्ट आफिस में हजार या पांच सौ का नोट नहीं दिया। नोटबंदी के बाद हम अपना आखिरी हजार का एक तथा पांच सौ के तीन नोट लेकर बैंक गये तो कैशियर ने जब तक उसको दराज में नहीं रखा तब तक हमारा दिल धक धक कर रहा था कि कहीं नकली निकले।  कहा जाता है कि पैसा कुछ करे या नहीं पर वह आत्मविश्वास पैदा करता है मगर बड़े नोट तो हमें चिंतित किये देते थे।  यह एक अप्राकृतिक स्थिति थी।  अब दो हजार और पांच सौ नोट आने पर हमारा हृदय प्रसन्न नहीं है। इसलिये तय किया है कि अपने बड़े भुगतान अब डेबिट कार्ड से ही करेंगे।  ऐसा नहीं है कि नोटबंदी का कष्ट हम नहीं झेल रहे पर नकली मुद्रा से तनाव की मुक्ति राहत भी दिला रही है। नकली मुद्रा का अंश असली के साथ कितना था, कम था या ज्यादा, आदि प्रश्नों से हमारा कोई लेना देना नहीं है।  हमारा मानना है कि उससे समाज में अनेक लोगों का मनोबल गिरा हुआ था जो कि देश के लिये अच्छी बात नहीं थी। एक योग तथा अध्यात्मिक साधक होने के कारण हमें मन के खेल का पता है और इसलिये ही नोटबंदी का समर्थन करते हैं।

Friday, November 11, 2016

हमें माया के दम पर उछलने वाले चूहों की अब ताकत देखनी है-कालेधन पर स्ट्राइक पर हिन्दी संपादकीय (Men money And mouse-HindiEditorial)

                           अब बात समझ में आ गयी।  नयी आर्थिक क्रांति की पीड़ा उन लोगों को जरूर होगी जिनके सिंहासन हिलने वाले हैं।  हम तो पहले ही कह रहे थे कि जिस कालेधन पर सर्जीकल स्ट्राइक की बात हुई हैं राष्ट्रवादी भक्त भूलें नहीं। भूलेंगे तो हम उन्हें याद दिलाते रहेंगे।  कोई भी क्रांति एक दिन में परिणाम नहीं देती।  उसके लिये चलाया गया अभियान रूप बदलता है तो उसके प्रवाहक भी कार्यशैली बदलते हैं।कालेधन पर यह सर्जीकल स्ट्राइक है जिसके परिणाम अभी तो दिखने शुरु हुए हैं।
कुछ लोग गरीबों, बीमारों और बेबसों की परेशानियों की चर्चा कर इसका विरोध कर रहे हैं। इधर भक्तगण भी सफाईयां देते फिर रहे हैं।  एक निष्पक्ष चिंतक के रूप में हमारा सीधे मानना है कि कालेधन का सबसे ज्यादा दुष्परिणाम समाज पर वह भी युवा वर्ग के लोगों पर हुआ है।  चंद समाज सेवक येनकेन प्रकरेण धन जमा कर राजपदों पर पहुंच जाते हैं। कुछ काले व्यापार के सहारे आर्थिक रूप से इतने ताकतवर होते हैं कि उन्हें राजपद के बिना ही भारी शक्ति मिल जाती है। फिर या तो उनका माथा फिरता है या उनकी औलादें मद में चूर होकर पूरे समाज को अपना चाकर समझती हैं। चंद बेरोजगार लोगों के अपने इर्दगिर्द एकत्रित कर अपनी सेना बना लेते हैं। गरीब युवाओं को तो ऐसे मानते हैं जैसे कि वह कोई आवारा पशु हो। अपनी कार से टकराने या मार्ग न देने वाले को मारते हैं-कभी जान भी लेते हैं। किसी युवती ने प्रणय निवेदन स्वीकार नहीं किया तो उस पर तेजाब डाल देते हैं।  रास्ते पर अपने वाहन इस तरह दौड़ाते हैं जैसे कि उनके बाप ने बनवाई हो-कोई मर जाये तो मर जाये परवाह नहीं।  ऐसे बिगड़ैल रईसजादों के बारे में ढेर सारे समाचार आते रहते हैं। जिन युवाओं के अभिभावकों के पास इतना धन नहीं है वह कुंठित होते हैं।  युवा मन का मरना हमारी नज़र में हमारी नज़र में बीमार के बिना इलाज मरने से ज्यादा खतरनाक है। कहने का अभिप्राय यह है कि अगर कालेधन के मद से जो समाज में वैमनस्य और अहंकार फैला है और युवा मन मरता है तो वह हमें ज्यादा दर्दनाक है।  हमारी नज़र में तो यह फैसला एक एतिहासिक है और इसके परिणाम अभी समाज पर देखा जाना बाकी है।  हम पर्द पर लोगों की परेशानियों से हमदर्दी नहीं रखते क्योंकि स्वयं भी झेल रहे हैं।  हम तो वर्तमान पीढ़ी मेें आत्मविश्वास देखना चाहते हैं जिसे धन के असमान वितरण की समस्या के कारण गिरे मनोबल के कारण जीवन बिताते हैं।
अपनी बात समाप्त खत्म करने से पहले यह पुरानी कथा सुनाते हैं जो हमने बचपन में पढ़ी थी और कालांतर में हमारे लिये अध्यात्मिक स्मरण शक्ति का आधार बनी। एक संत ने एक गृहस्थ के घर भोजन किया। भोजन के समय गृहस्थ अपने हाथ में एक लकड़ी पकड़े बैठा रहा।
संत ने पूछा-‘तुम लकड़ी क्यों पकड़े बैठे हो।’
गृहस्थ ने उनके ठीक ऊपर टाण पर रखी एक हांडी की तरफ इशार करते हुए कहा-‘कुछ नहीं महाराज! एक चूहा इधर आता है और उस हांडी तक पहुंच जाता है। वह इधर नहीं आये इसलिये उसे भगाने के लिये यह लकड़ी पकड़े बैठा हूं।’
संत ने पूछा-‘उसमें क्या धन रखा है?’
गृहस्थ की आंखें फटी रह गयीं और वह बोला-‘महाराज आप तो वाकई सिद्ध हैं। उसमें मेरी अशर्फियां रखी हैं।’
संत ने कहा-‘इसमेें सिद्ध जैसी कोई बात नहीं है।  वहां रखी सोने की अशर्फियां उसमें इतनी ताकत पैदा कर रही हैं। तुम वह निकालकर अपने पास रख लो। थोड़ी दूर जाकर बैठते हैं फिर देखो चूहा चढ़ पाता है या नहीं।
गृहस्थ ने उसमें से अशर्फियां निकाली और हाथ में पकड़ कर संत के साथ दूर बैठ गया।  वहां चूहा आया और दीवार पर चढ़ने का प्रयास करने लगा पर तत्काल गिर जाता था।
आश्चर्यचकित होकर गृहस्थ ने संत के पांव छू लिये तो उन्होंने कहा-‘मनुष्य और पशु पक्षियों में बुद्धि को लेकर कोई अंतर नहीं है।  वह सोने की अशर्फियां चूहे को अंदर वहां तक पहुंचने की प्रेरणा पैदा कर रही हैं। यही मनुष्य का हाल है माया की प्रेरणा से वह भी इसी तरह उछलता है।
इस कहानी का यथार्थ हमने देश में बढ़ते काले धन के प्रभाव के रूप में देखा है।  जिन लोगों के पास धन है वह भगवान का दर्जा चाहते हैं।  वह अपनी निरंकुशता में मनोरंजन चाहते हैं।  हम देखना चाहते हैं कि आखिर इन मनुष्य रूपी चूहों में कितना बल रहा जाता है।
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