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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Friday, November 11, 2016

हमें माया के दम पर उछलने वाले चूहों की अब ताकत देखनी है-कालेधन पर स्ट्राइक पर हिन्दी संपादकीय (Men money And mouse-HindiEditorial)

                           अब बात समझ में आ गयी।  नयी आर्थिक क्रांति की पीड़ा उन लोगों को जरूर होगी जिनके सिंहासन हिलने वाले हैं।  हम तो पहले ही कह रहे थे कि जिस कालेधन पर सर्जीकल स्ट्राइक की बात हुई हैं राष्ट्रवादी भक्त भूलें नहीं। भूलेंगे तो हम उन्हें याद दिलाते रहेंगे।  कोई भी क्रांति एक दिन में परिणाम नहीं देती।  उसके लिये चलाया गया अभियान रूप बदलता है तो उसके प्रवाहक भी कार्यशैली बदलते हैं।कालेधन पर यह सर्जीकल स्ट्राइक है जिसके परिणाम अभी तो दिखने शुरु हुए हैं।
कुछ लोग गरीबों, बीमारों और बेबसों की परेशानियों की चर्चा कर इसका विरोध कर रहे हैं। इधर भक्तगण भी सफाईयां देते फिर रहे हैं।  एक निष्पक्ष चिंतक के रूप में हमारा सीधे मानना है कि कालेधन का सबसे ज्यादा दुष्परिणाम समाज पर वह भी युवा वर्ग के लोगों पर हुआ है।  चंद समाज सेवक येनकेन प्रकरेण धन जमा कर राजपदों पर पहुंच जाते हैं। कुछ काले व्यापार के सहारे आर्थिक रूप से इतने ताकतवर होते हैं कि उन्हें राजपद के बिना ही भारी शक्ति मिल जाती है। फिर या तो उनका माथा फिरता है या उनकी औलादें मद में चूर होकर पूरे समाज को अपना चाकर समझती हैं। चंद बेरोजगार लोगों के अपने इर्दगिर्द एकत्रित कर अपनी सेना बना लेते हैं। गरीब युवाओं को तो ऐसे मानते हैं जैसे कि वह कोई आवारा पशु हो। अपनी कार से टकराने या मार्ग न देने वाले को मारते हैं-कभी जान भी लेते हैं। किसी युवती ने प्रणय निवेदन स्वीकार नहीं किया तो उस पर तेजाब डाल देते हैं।  रास्ते पर अपने वाहन इस तरह दौड़ाते हैं जैसे कि उनके बाप ने बनवाई हो-कोई मर जाये तो मर जाये परवाह नहीं।  ऐसे बिगड़ैल रईसजादों के बारे में ढेर सारे समाचार आते रहते हैं। जिन युवाओं के अभिभावकों के पास इतना धन नहीं है वह कुंठित होते हैं।  युवा मन का मरना हमारी नज़र में हमारी नज़र में बीमार के बिना इलाज मरने से ज्यादा खतरनाक है। कहने का अभिप्राय यह है कि अगर कालेधन के मद से जो समाज में वैमनस्य और अहंकार फैला है और युवा मन मरता है तो वह हमें ज्यादा दर्दनाक है।  हमारी नज़र में तो यह फैसला एक एतिहासिक है और इसके परिणाम अभी समाज पर देखा जाना बाकी है।  हम पर्द पर लोगों की परेशानियों से हमदर्दी नहीं रखते क्योंकि स्वयं भी झेल रहे हैं।  हम तो वर्तमान पीढ़ी मेें आत्मविश्वास देखना चाहते हैं जिसे धन के असमान वितरण की समस्या के कारण गिरे मनोबल के कारण जीवन बिताते हैं।
अपनी बात समाप्त खत्म करने से पहले यह पुरानी कथा सुनाते हैं जो हमने बचपन में पढ़ी थी और कालांतर में हमारे लिये अध्यात्मिक स्मरण शक्ति का आधार बनी। एक संत ने एक गृहस्थ के घर भोजन किया। भोजन के समय गृहस्थ अपने हाथ में एक लकड़ी पकड़े बैठा रहा।
संत ने पूछा-‘तुम लकड़ी क्यों पकड़े बैठे हो।’
गृहस्थ ने उनके ठीक ऊपर टाण पर रखी एक हांडी की तरफ इशार करते हुए कहा-‘कुछ नहीं महाराज! एक चूहा इधर आता है और उस हांडी तक पहुंच जाता है। वह इधर नहीं आये इसलिये उसे भगाने के लिये यह लकड़ी पकड़े बैठा हूं।’
संत ने पूछा-‘उसमें क्या धन रखा है?’
गृहस्थ की आंखें फटी रह गयीं और वह बोला-‘महाराज आप तो वाकई सिद्ध हैं। उसमें मेरी अशर्फियां रखी हैं।’
संत ने कहा-‘इसमेें सिद्ध जैसी कोई बात नहीं है।  वहां रखी सोने की अशर्फियां उसमें इतनी ताकत पैदा कर रही हैं। तुम वह निकालकर अपने पास रख लो। थोड़ी दूर जाकर बैठते हैं फिर देखो चूहा चढ़ पाता है या नहीं।
गृहस्थ ने उसमें से अशर्फियां निकाली और हाथ में पकड़ कर संत के साथ दूर बैठ गया।  वहां चूहा आया और दीवार पर चढ़ने का प्रयास करने लगा पर तत्काल गिर जाता था।
आश्चर्यचकित होकर गृहस्थ ने संत के पांव छू लिये तो उन्होंने कहा-‘मनुष्य और पशु पक्षियों में बुद्धि को लेकर कोई अंतर नहीं है।  वह सोने की अशर्फियां चूहे को अंदर वहां तक पहुंचने की प्रेरणा पैदा कर रही हैं। यही मनुष्य का हाल है माया की प्रेरणा से वह भी इसी तरह उछलता है।
इस कहानी का यथार्थ हमने देश में बढ़ते काले धन के प्रभाव के रूप में देखा है।  जिन लोगों के पास धन है वह भगवान का दर्जा चाहते हैं।  वह अपनी निरंकुशता में मनोरंजन चाहते हैं।  हम देखना चाहते हैं कि आखिर इन मनुष्य रूपी चूहों में कितना बल रहा जाता है।
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Thursday, October 27, 2016

गीता का ज्ञान बघारने वाले बहुत मिलते हैं-हिन्दी लेख (Gita ka Gyan Bagharne wale bahut milte hain-Hindu Article)

                  बहुत छोटे पर प्रकृति तथा जीव के दैहिक, मानसिक तथा बृहद वैचारिक ज्ञान तथा विज्ञान से सुज्जित ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता का प्रादुर्भाव भारत में ही हुआ। ज्ञानी वही है जिसने उसका ज्ञान धारण किया है।  ज्ञानी जनमानस व्यवहार से एक दूसरे के स्तर की पहचान गीता के ज्ञान से करते हैं पर सामान्य लोग उसका ज्ञान बघार कर अपने लिये ज्ञान का प्रमाण पत्र जुटाते हैं।
                      हमने श्रीमद्भागवत गीता तथा अन्य धर्मग्रंथों के अध्ययन के बाद चिंत्तन और मनन के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि हमारे ऋषि, तपस्वी तथा महापुरुषों ने भारत में ज्ञान का संचय इस कारण ही किया क्योंकि यहां सबसे ज्यादा अज्ञानी रहते हैं।  कहते हैं कि भारत भूमि पर ही देवता अवतरित होते हैं इसका कारण भी यह है कि दैत्य भी यहीं बसते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि सबसे श्रेष्ठ और सबसे दुष्ट मनुष्य हमारी अध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण भारत भूमि पर ही होते हैं।
                                 हमने अनुभव किया है कि अगर किसी ने भाषा में लिखना या बोलना सीख लिया तो उसके अभिव्यक्ति होने के लिये दो ही मार्ग होते हैें। एक तो वह अध्यात्मिक ग्रंथों के ज्ञान की चर्चा कर अपनी साधना की प्रक्रिया पूरी करे या फिर वह इनमें वर्णित व्यंजना विधा में लिखी गयी कहानियों के निष्कर्षों पर कटाक्ष कर अपने आधुनिक विद्वान होने का प्रचार करे।
                           हमने जब सोशलमीडिया पर आठ वर्ष पूर्व लिखना प्रारंभ किया था तब अध्यात्मिक ग्रंथों से संदेश पढ़कर अपनी अभिव्यक्ति देने लगे।  पढ़ने के बाद हमें यह अनुभव हुआ कि उसके ज्ञान का ऐसा भंडार है जो अन्यत्र नहीं हो सकता।  श्रीगीता पढ़ने क बाद लगा कि उसके आगे तो कुछ है ही नहीं।
                  बहरहाल हमने मान लिया कि इस संसार में हर तरह की प्रवृत्ति के व्यक्ति की उपस्थिति सहजता से स्वीकार करनी होगी।  हम जैसे हैं वैसे सब हो जायें यह तो सपने में भी नहीं सोचा। इसके विपरीत हम अनेक विद्वानों को अपने जैसा संसार बनाने के लिये प्रयासरत देखते हैं तो हंसी आती हैं।  हम किसी के वाक्यांश पर प्रहार नहीं करते क्योंकि जानते हैं कि उसके मन मस्तिष्क के पटल पर यही अंकित है।
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Sunday, October 23, 2016

कश्मीर पर चुभती बात अब मासूम चेहरे वाले विद्वान कहेंगे-हिन्दी संपादकीय (Now Lul Face would Saying criticle Word In Kashmir-Hindi Editorial

                                       कुछ लोगों को हम वाकई सरल प्रकृति का समझते हैं पर जब चालाकी से अपनी बात दूसरे को दुखाने के लिये कहते हैं तब उनकी पोल खुल ही जाती है। हम टीवी पर बहसों में आने वाले एक निष्पक्ष लेखक को बड़ा सीदा और सज्जन समझते थे। आज उनका कश्मीर के संबंध में एक पाठ देखा तो हैरानी हुई।  उसमें उन्होंने लिखा कि कश्मीर की धरती पर हमारे पास हैं पर लोग हमारे साथ नहीं हैं। पहली बात तो हम यह बतायें कि हम बचपन से देखते आ रहे हैं कि कश्मीर में सब कुछ सामान्य रहा तब वहां कोई आंदोलन वगैरह या प्रथकतावाद का कोई सवाल नहीं आया।  1971 के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका और ब्रिटेन की शहर पर वहां आतंकवाद शुरु किया तब से यह मामला चला। 
                कुछ चुभने वाली ऐसी बातें मासूम दिखने वाले लोग कहते हैं तो लगता है कि उन्हें खरीदकर लिखवाया गया है। हमारे देश के कुछ अखबार भी बिना सोचे समझे छाप देते हैं-या सरकार को बदनाम करने की उनकी ऐसी योजना रहती है यह पता नहीं। हमारा तो एक ही सवाल है कि ‘अगर लोग साथ नहीं है तो लोकसभा और विधानसभा चुनावों में 67 प्रतिशत मतदान भूतप्रेत करने आते हैं।
                 जनाब! सामान्य लोगों की अगर सरकार नहीं सुनती तो अपराधी भी नहीं सुनते।  अपराधी का लट्ठ चलता है तो लोग उससे डरे सहमे रहते हैं पर एक बार वह पुलिस के हत्थे चढ़ जाये उससे किनारा कर लेती है।  कश्मीर में अभी तक अलगावादियों का लट्ठ चल रहा है इसलिये लोग खामोश हैं। जिस दिन सरकार उन्हें लपेट लेगी उस दिन जनता उसके साथ हो जायेगी। सरकार जीती तो जनता उसके साथ हो जायेगी। 
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        हमने सुना था कि पाकिस्तान भारतीय बुद्धिजीवियों को खरीदने के लिये पैसा खर्च कर रहा है। हमें लग रहा है कि संभवतः अब वह ऐसे बुद्धिजीवियों को भी सामने लायेगा जो मासूम चेहरे वाले होंगे और उसकी बात इस तरह कहें जैसे कि वह निष्पक्ष विश्लेक्षक की हो। 
           भारतीय प्रचार माध्यम इस समय जनमानस को उत्तर प्रदेश के ‘परिवार विवाद’ और क्रिकेट में व्यस्त रखे हुए हैं। इस बीच खबर है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को चेतावनी दी है कि अगर उसने आतंकवाद पर नियंत्रण नहीं किया तो वह उसके अंदर घुसकर मारेगा।  यह गंभीर चेतावनी है। इधर पाकिस्तान अपनी झैंप मिटाने के लिये सीमा पर गोलीबारी कर रहा है। उसके पालतू  एक तरह से कश्मीर में अंतिम युद्ध लड़ रहे हैं। ऐसा लगता है कि आगामी कुछ माह में पाकिस्तान का निपटारा इस तरह होगा कि कोई उसकी अभी कल्पना भी नहीं कर रहा है।

Thursday, October 20, 2016

राष्ट्रप्रमुख मित्र हैं, जनता एक दूसरे को जानती नहीं फिर लड़ाई क्यों होती है-हिन्दी संपादकीय (National Chief0 are Good Freind, Public Not Nowledgeble, than Why does Fight Between Two Coutry-Hindi Editorial)

                                         भारत पाकिस्तान और चीन तीनों के बीच साठ बरस से द्वंद्व चलता रहा है। बचपन से लेकर इन तीनों के बीच विवादों की चर्चा सुनते आ रहे हैं। एक प्रश्न हमारे दिमाग में आता है कि प्रारंभ से तीनों देशों के राजप्रमुख आपस में बड़े आराम से मिलते रहे हैं।  तीनों देशों के जनमानस का आपस में कोई सीधा संबंध रहता नहीं है। तब सवाल आता है कि देशभक्ति के नाम पर इन तीनों देशों की जनता एक दूसरे के प्रति संशंकित क्यों रहती है? राजप्रमुखों के आपस में मधुर संबंध और जनता एक दूसरे को जानती नहीं। फिर वह मध्य में कौन लोग हैं जो इस तरह की दुश्मनी निभाते हैं।
                     हम अगर अब भी देखें तो भारतीय प्रधानमंत्री तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की नातिन की शादी में पहुंच गये। चीन के राष्ट्रपति जब भारतीय प्रधानमंत्री के साथ फोटो में ऐसे खड़े होते हैं जैसे शैक्षणिक काल के मित्र हों। चीन से नाराजगी के बाद भारत में उसकी सामग्री की मांग मेें 20 से 60 प्रतिशत गिरावट की बात कही गयी है-हम आधा ग्लास खाली की बजाय आधा भरा कहने के सिद्धांत पर चलें तो यह तय है कि फिर भी उसकी सामग्री बिक रही है। मांग में गिरावट का कारण नाराजगी या क्रय क्षमता में कमी है-इस पर अलग से बहस करने की आवश्यकता है। 
                   हमने अपने एक पाठ में हिन्दी चार ‘प’-पंूजीपति, प्रचार स्वामी, प्रबंधन तथा पकड़बाजों ( अंग्रेजी में चार ‘एम’-मनीमेकर, मीडिया, मैनेजमेंट तथा माफिया)- के संयुक्त उद्यम के सक्रिय होने की बात कही थी। यही समूह समाज के आम जनमानस पर नियंत्रण करने की योजना बनाकर उन पर अमल करता है। प्रबंधन और जनमानस के बची बाकी तीनों अपना काम करते हैं। पूंजीपति, प्रचार स्वामी  तथा पकड़बाजों के आपसी संपर्कों का सहजता से पता लगाना संभव नहीं पर प्रत्यक्ष यह लगता है कि सभी आपस में जुड़े हुए हैं-प्रचार समूह अपने लाभ के अनुसार ही समाचार और बहसें चलाते प्रतीत होते हैं।  जब प्रचार माध्यमों में देशभक्ति पर बहस होती है तो ऐसा लगता है कि यह विषय भी विक्रय योग्य हो गया है।  दो महीने पहले चीन और पाकिस्तान के प्रति कोई ऐसी घृणा नहीं थी पर प्रचार माध्यमों से ऐसा जादू चलाया कि सभी लोग देशभक्ति का राग सुनकर हैरान हैं। पाकिस्तानी कलाकारों को यहां लाया कौन? वही लोग जो अब देशभक्ति के नाम पर उनको भगा रहे हैं।
सामान्य जनमानस हमेशा ही प्रचार माध्यमों के प्रभाव में बना रहता है पर हम जैसे चिंत्तक कभी कभी इस बात पर विचार करते हैं कि जिस तरह आज भौतिकतावादी युग में अर्थ की प्रधानता है उसमें देश की कला, राजनीति, अर्थ, साहित्य, पत्रकारिता के क्षेत्र में सौ फीसदी शुचिता तो छोड़िये पचास की राह पर चले यह संभव नहीं है।  जब से हमने क्रिकेट में फिक्सिंग का भूत देखा है हमारी स्थिति यह है कि सभी जगह वही दिखाई देता है। हमारे पास सूचना के ज्यादा साधन नहीं है पर अतर्जाल पर इतने मित्र हैं कि उनके पाठों से कई ऐसी बातें मिलती हैं जिनको पढ़कर यही कहते हैं कि ‘यहां सब चलता है’ तथा ‘बिकने की कला आ जाये तो अपना चेहरा दिखाने के लिये कई आकर्षक स्थान मिल जाते हैं। बस, अपना चेहरा आईने और चरित्र ज्ञान से दूर रखना चाहिये।
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Monday, October 17, 2016

छोटे व मध्यम व्यापारियों की कमाई का भी ध्यान रखना होगा-चीनी सामान के बहिष्कार से देशभक्ति जोड़ने पर एक लेख (Attension takes of Poor and Middle Class Treders-Boycott of chines good and Natinaliti-Hindi Article)


                                                            चीन भारत के प्रति शत्रुभाव रखता है यह सर्वविदित है और हम तो उसके भारत के उपभोक्ता बाज़ार में खुले प्रवेश पर पहले भी सवाल उठाते रहे हैं। सबसे बड़ा हमारा सवाल यह रहा है कि भारत में लघुउद्योग व कुटीर उद्योग को प्रोत्साहन की नीति थी वह सफल क्यों नहीं रही? इन लघु व कुटीर उद्योगों में निर्मित छोटे छोटे सामान भारतीय परंपराओं का अभिन्न भाग होते थे। यह पता ही नहीं चला कि चीनी सामान ने भारतीय बाज़ार में प्रवेश किया पर इतना तय है कि यह देश के आर्थिक तथा राजनीति के शिखर पर विराजमान लोगों के आंखों के सामने ही हुआ था-या कहें उन्होंने अपनी आंखें फेर ली थीं।
                                           अब अचानक चीन के एक आतंकी के प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार दिखाने पर उसके सामान के बहिष्कार का आह्वान देशभक्ति के नाम पर किया जा रहा है।  सच कहें तो अब देशभक्ति को सस्ता बनाया जा रहा है।  इस समय दिवाली के अवसर पर पर्व से संबंधित पटाखे, सजावाट का सामान तथा खिलौने आदि न खरीदने के लिये जोरदार अभियान चल रहा है।  हम बता दें कि मोबाइल, लेपटॉप तथा कंप्यूटर में भी ढेर सारा चीनी सामान लगा है।  अनेक आधुनिक सामान तो चीन से पुर्जें लाकर यही संयोजित किया जाता है।  हमें एक दुकानदार ने बताया था कि इनवर्टर, स्कूटर , कार तथा चाहे कहीं भी लगने वाली जो भी बैट्री हो वह चीन में ही बनती है।  इस समय बड़े व्यापारियों से कोई अपील नहीं कर रहा-क्योंकि उन्हें शायद देशभक्ति दिखाने की जरूरत नहीं है।  इसके लिये आसान शिकार मध्यम तथा निम्न वर्ग का व्यवसायी बनाया जा रहा है।  हम यहां चीनी सामान बिकने का समर्थन नहीं कर रहे पर हमारे देश के मध्यम तथा निम्न वर्ग के व्यवसायियों के रोजगार की चिंता करने से हमें कोई रोक नहीं सकता।  वैसे ही हमारे देश में रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं।  आजकल छोटे व्यापारी आधुनिक मॉल संस्कृति के विकास के कारण वैसे भी अस्तित्व का संघर्ष कर रहे हैं-स्थित यह है कि उनकी नयी पीढ़ी अपना पैतृक काम छोड़कर नौकरी की तलाश में घूम रही हैं।  ऐसे में दिपावली तथा होली जैसे पर्वों के समय जो अधिक कमाने की जिम्मेदारी योजना होती है उस पर पानी फिरा जा रहा है।  अनेक लोगों ने चीन का सामान भरा है और अगर उनकी बिक्री कम हुई तो पूंजी का नाश होगा-हालांकि जिस तरह महंगाई व आय के असमान वितरण ने जिस तरह समाज के एक बहुत बड़े वर्ग की क्रय क्षमता को कम किया उससे भी दीवाली पर चीनी सामान की बिक्री कम हो सकती है। यह अलग बात है कि इसे देशभक्ति के खाते में ही दिखाया जायेगा।
                                       अपनी रक्षा की इच्छा रखने वाला हर आदमी देश के प्रति वफादार होता है-देशभक्ति दिखाने में उत्साह रखना भी चाहिये पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम हर छोटे विषय पर भी अपने दाव खेलने लगे।  देश में आर्थिक असमंजसता का वातावरण है इसलिये यह ध्यान रखना चाहिये कि अपने नागरिकों की हानि न हो। हमें सबसे ज्यादा आपत्ति उस योग शिक्षक पर कर रहे हैं जिसने योग व्यवसाय के दम पर बड़ी कंपनी बनाकर पूंजीपति का उपाधि प्राप्त कर ली और अब चीनी सामान के बहिष्कार का आह्वान कर रहा है।  इस तरह वह छोटे व्यापारियों को उसी तरह संकट में डाल रहा है जैसे कि उसकी हर मोहल्ले में खुली दुकानें डाल रही हैं।  अगर उसमें हिम्मत है तो चीन से आयात करने वाले बड़े दलालों, व्यापारियों तथा उद्योगपतियों से देशभक्ति दिखाने को कहें-जिनका अरबों का विनिवेश चीन में हैं।  प्रसंगवश हमने हमेशा ही मध्यम वर्ग के संकट की चर्चा की है और इस विषय में जिस तरह देशभक्ति दिखाने के लिये फिर उसे बाध्य किया जा रहा है उस पर हमारी नज़र है।
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Friday, October 14, 2016

मूढ़ नास्तिक भ्रमवश आस्तिक ही होते हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख (Nastik and Aastik-Hind Thought article)


                           हमारा एक मित्र नास्तिकतावादी है।  हमारे साथ कहीं घूमने चला तो एक मंदिर देखकर अपने उसके अंदर चलने का आग्रह किया। वह बोला-‘तुम जाओ, मैं तो बाहर बैठकर ठेले पर चाय पीऊंगा। मैं तुम्हारी तरह अंधविश्वासी नहीं हूं।’
               हमने कहा’ठीक है! मैं अंदर जाकर ध्यान लगाता हूं। पंद्रह मिनट बाद लौट आऊंगा।’
                      वह बोला-‘तुम उस पत्थर की मूर्ति पर जाकर ध्यान क्यों लगाते हो? यहां इतने सारे पत्थर रखे हैं। किसी पर भी ध्यान लगा लो।’
                 हमने कहा-‘मैं लगा लेता, पर यहां न शांति है न सफाई! मंदिर में सेवक सफाई रखते हैं।’
                             थोड़ी देर बाद लौट तो वह इधर उधर घूमता दिखाई दिया। हमसे कहने लगा-‘यार, तुमने आधा घंटा लगा दिया। मैं यहां इंतजार कर रहा हूं।’
                               हमने कहा-‘अंदर आ जाते। हमारा ध्यान भंग कर देते।’
                          वह बोला-‘नहीं, मैं नास्तिक हूं। पत्थर के भगवान के मंदिर में नहीं आ सकता।’
                   मैंने हंसते हुए कहा-‘‘कमाल है! मैं तुम्हारे कहने से बाहर रखे पत्थर पर भी ध्यान लगाने को तैयार था।  श्रद्धा होने पर मेरे लिये वहां अपना इष्ट प्रकटतः होता। अब तुम मुझे जवाब दो बाहर रखा पत्थर अगर तुम्हारे लिये पत्थर है तो अंदर भगवान को भी  पत्थर मान लेते।  कहा भी जाता है कि ‘मानो तो भगवान नहीं मानो तो पत्थर’। अपने नास्तिक होने का भय तुम्हें इतना है कि पत्थर का भगवान भी तुम्हें चिंता में डाल देता है।’’
                                 वह नास्तिकतवादी मित्र हमारे लिये लिखने के अच्छी सामग्री प्रदान करता है।  उसी की वजह से हम आस्तिक नास्तिक की बहस बचते हैं।  उस पर पिछले 20 वर्ष की योग साधना की ध्यान क्रिया ने अध्यात्म विषय पर हमें इतना परिपक्व बना दिया है कि नास्तिक तो छोडि़ये आस्तिक भी ज्ञान चर्चा में हावी नहीं हो पाते।  हमने उस नास्तिकतावादी मित्र से पूछा था कि ‘जब कोई किसी पत्थर में भगवान देखता है तो तुम उससे चिढ़ते की बजाय उसकी पत्थर मानकर उपेक्षा क्यों नहीं करते? वहां जाने से तुम बिदकते क्यों हो?’
                            हमारा मानना है कि नास्तिकतावाद नैराश्य, कुंठा तथा निष्क्रियता को बढ़ावा देता है।  मजे की बात यह नास्तिकवादी व्यसनों में ज्यादा फंसे दिखते हैं-कम से कम हमारे चार ऐसे मित्र हैं जो बेहतर इंसान होना भक्त से बेहतर मानते हैं पर वह व्यसनों के दास हैं।
                           हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि ‘परमात्मा का रूप अनंत और अचिंत्तन्य हैं।’  सीधी बात यह कि इंसान की यह स्वयं की समस्या है कि वह आस्तिक बने या नास्तिक।  जैसा उसका संकल्प होगा वैसा ही यह संसार उसके लिये बन जायेगा-हमारा दर्शन ज्ञान और विज्ञान पर आधारित है, जिसमें मनुष्य को जीवन के प्रति सकारात्मक भाव अपनाने को कहा जाता है। आस्तिकता से सकारात्मक भाव बढ़ता है और नास्तिकता से नकारात्मकता बढ़ती है।  नास्तिकों को इसी से भी मूढ़ मान सकते हैं कि वह मृत व्यक्ति की कब्र पर बने ताजमहल में प्रगतिशीलता और संगमरमर की बनी भगवान की प्रतिमा में पिछड़ापन देखते हैं।  हमने अपनी राय बता दी थी कि प्रतिमायें पत्थर की होती है भगवान तो उसमें हमारी श्रद्धा से आते हैं और उससे हमारे अंदर आत्मविश्वास आता है कि कोई हमारे साथ है।
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Sunday, October 9, 2016

राज्यप्रमुख को अपनी सफलता जनता के साथ बांटना चाहिये-हिन्दी संपादकीय (StateChief Should Share His Succes with Public-HindiEditorial)

                                        राज्यप्रमुख का यह दायित्व है कि वह अपनी जनता का मनोबल भी बनाये रखे-ऐसा हमारे अध्यात्मिक दर्शन के प्रमुख विद्वान कौटिल्य का कहना है। अभी बताया जा रहा है कि पाकिस्तान के आतंकवादी हमलों का बदला भारत की सरकार ने पहले भी लिया था।  कभी यह घटना प्रमुख समाचार होना चाहिये थी पर अब रहस्योद्घाटन की तरह सामने आ रही है।  दरअसल अब भारतीय सेना ने सीमा पारकर उरी हमले का बदला पाकिस्तानी सेना से लिया और इसको प्रचारित भी किया। उसके बार पाकिस्तान के साथ विश्व में सनसनी फैल गयी-पाकिस्तान तो बहुत डर गया है और वहां अब अनेक चिंतायें घर करने लगी हैं।  इससे भारतीय जनमानस में उरी बदले के बाद की कार्यवाही करने के लिये अपनी सेना के प्रति सम्मान बढ़ा है।  कुछ लोगों को इस बदले की कार्यवाही पर नहीं वरन् उसके  प्रचार पर एतराज हैं।  हमें नहीं हैं क्योंकि जब पिछले हमले हुए थे उसमें देश की हानि होने से हमारा मनोबल गिरा था। बदले की कार्यवाही  हुई पर बताया नहीं गया जिससे हमें तसल्ली होती। 
             हमें याद है कि हमारे सैनिकों के सिर काटकर पाकिस्तानी सेना ले गयी थी। तब मन में बहुत पीड़ा हुई थी।  अब कह रहे हैें कि उस समय भारतीय सेना ने भी तीन पाकिस्तानियों के सिर काटे थे।  अब बताने का फायदा नहीं है क्योंकि उस घटना की पीड़ा हमारे मन में बहुंत समय तक रही थी।  हम मानते हैं कि भारतीय सेना ने बदला लिया पर उसका प्रचार नहीं हुआ। इससे पाकिस्तान के कर्ताधर्ता अपनी छवि विश्व में बनाये हुए थे और अवसर मिलने पर घातक प्रहार करते रहे।  इतना ही नहीं भारत में पाक समर्थक बुद्धिमानों का समूह भी अपना काम करता रहा।  अब समस्या यह हो गयी है कि भारत ने जमकर अपनी कामयाबी का प्रचार किया है जिससे पाकिस्तान की छवि एक कमजोर राष्ट्र के रूप में हो रही है।  इससे पाकिस्तान तथा भारत में उसकी समर्थक बुद्धिजीवी समूह की छाती पर सांप लोट रहा है।  भारत की वैश्विक प्रचार जगत में पाकिस्तान पर बढ़त बनी हुई हैं और यही तो हम चाहते थे।  आजकल प्रचार का युग है इसलिये हर राज्यप्रमुख को अपनी सफलता सार्वजनिक रूप से जनता के साथ बांटना चाहिये। इसलिये हम अपने वीर जवानों को सलाम करते हैं।
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अन्य ट्विटर पाठ

                   आजकल प्रचार जगत में अक्षयकुमार और अजय देवगन के वक्तव्य राष्ट्रभक्ति के संदर्भ में प्रमुखता से आ रहे हैं। पहले क्यों इनकी अनदेखी होती थी कोई बतायेगा? हम सीधी बात बताते हैं कि राज्य प्रबंध का समाज पर बहुत प्रभाव होता है और उसकी गतिविधियों से अप्रत्यक्ष संकेत भी लोगों पर प्रभाव डालते हैं। अक्षय कुमार, अनिली कपूर, अजय देवगन और सुनील शेट्टी हिन्दी फिल्मों मेें ऊंचे स्तर के अभिनेता हैं। अक्षयकुमार के बारे में तो कहा जाता है कि वह फिल्म जगत को सबसे अधिक राजस्व अर्जन में योगदान देता है। बरसों तक उसका प्रचार ऐसे होता रहा जैसे कोई साधारण कलाकार हो।  सुनील शेट्टी और अजय देवगन भी बहुत बरसों से सफल फिल्में देते रहे हैं पर प्रचार में उनके बयान कभी प्रमुखता से नहीं आये।   अब अचानक उन्हें महत्व मिलने लगा है।

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                             बात तो सही है कि जब सीमा  पर शहीद जवानों का शव तिरंगे में लिपटकर आता है तब कोई सबूत नहीं मांगता पर अब जब सीमा पार जाकर दुश्मनों को निपटाकर कर जीवित आये हैं तो सबूत मांगे जा रहे हैं।  हमारी सलाह है ऐसे लोग अपने मित्र पाकिस्तान का रुदन देकर समझ क्यों नहीं जाते या उसे सांत्वना देने के लिये अपना कर्तव्य निभा रहे हैं।
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                   वैसे राष्ट्रवादियों ने कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया पर हमने अनेक पाठ इस पर लिखे थे।  अब भी राष्ट्रवादी शायद ही  इस बात को समझ पायें कि राज्य प्रबंध भी समाज पर बहुत प्रभाव डालता है। अतः जरूरी है कि इसमें कुशलता दिखाते हुए जनहित भी करना चाहिये । अंततः राज्य प्रबंध से जनमानस का अर्थ भी सिद्ध होना चाहिये वरना अलोकप्रिय होने पर पर हवा विपरीत दिशा में भी चली जाती है।
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