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Monday, May 18, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-विद्वान को राज्य का आश्रय मिलता है

उतमाभिजनोपेतानम न नीचैः सह वर्द्धयेतु।
कृशीऽपि हिवियेकहो याति संश्रयणीयाताम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो उत्तम गुणों वाले हों उनको नीच गुणों वालों से मेल नहीं करना चाहिये। इसमें संदेह नहीं है कि संकट में आये उत्तम गुणी विद्वान को राज्य का आश्रय अवश्य प्राप्त होता है।

निरालोके हिः लोकेऽस्मिन्नासते तत्रपण्डिताः।
जात्यस्य हिं मणेयंत्र काचेन समता मताः।।
हिंदी में भावार्थ-
जो व्यक्ति ज्ञान के अंधेरे में रहते हैं उनके समीप विद्वान लोग नहीं बैठते। जहां भला मणि हो वहां कांच के साथ कैसा व्यवहार किया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आदमी को अपने गुणों की पहचान करते हुए समान गुणों वाले लोगों से ही मेल मिलाप करना चाहिये। अगर कोई व्यक्ति अधिक शिक्षित व्यक्ति है और वह अशिक्षितों में बैठकर अपने ज्ञान का बखान करता है तो वह लोग उसकी मजाक बनाते हैं। कई तो कह देते हैं कि ‘पढ़े लिखे आदमी किस काम के?’
उसी तरह अशिक्षित व्यक्ति जब शिक्षितों के साथ बैठता है तो वह उसकी मजाक उड़ाते हैं कि देखोे बेचारा यह पढ़ नहीं पाया। इस तरह समान स्तर न होने पर आपस में एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति मनुष्य में स्वाभाविक रूप से होती है।
कहने को कहा जाता है कि यहां झूठे आदमी का बोलबाला है पर यह एक वहम है। अगर व्यक्ति शिक्षित, ज्ञानी और कर्म में निरंतर अभ्यास में रत रहने वाला है तो विपत्ति आने पर उसे राज्य का संरक्षण अवश्य प्राप्त होता है। बेईमानी, भ्रष्टाचार और अनैतिक व्यापार करने वालों को हमेशा राज्य से भय लगा रहता है। उनके पास बहुत सारा धन होने के बावजूद उनका मन अपने पापों से त्रस्त रहता है। कहते हैं कि पाप की हांडी कभी न कभी तो फूटती है। यही हालत अनैतिक आचरण और कर्म से कमाने वालों की है। वह अगर इस प्रथ्वी के दंड से बचे भी रहें तो परमात्मा के दंड से बचने का उनके पास कोई उपाय नहीं है। वह अनैतिक ढंग से धन कमाकर अपने परिवार का भरण भोषण करते हैं पर उनके साथ शारीरिक विकार लगे रहते हैं। इसके अलावा उनके काले धन के प्रभाव से उनके परिवार के सदस्यों का आचरण भी निकृष्टता और अहंकार से परिपूर्ण हो जाता है जिसका बुरा परिणाम आखिर उनकेा ही भोगना पड़ता है।
उसी तरह जो लोग अपने जीवन में नैतिकता और ईमानदारी के सिद्धांतों का पालन करते हैं उनके परिवार सदस्यों पर भी उसका अच्छा प्रभाव पड़ता है। चाहे लाख कहा जाये सत्य के आगे झूठ की नहीं चल सकती जैसे मणि के आगे कांच का कोई मोल नहीं रह जाता।
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Sunday, May 17, 2009

भर्तृहरि नीति शतक:अच्छी मित्रता सज्जनता का प्रमाण

नीति विशारद भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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वांछा सज्जनंगमे परगुणे प्रीतिर्गुरो नम्रता विद्यायां व्यसनं स्वयोषिति रतिर्लोकापवादाद्भयम्
भक्तिः शूलिनि शक्तिरात्मदमने संसर्गमुक्तिः खले येष्वते निवसन्ति निर्मलगुणास्तेभ्यो नरेभ्यो नमः

हिंदी में भावार्थ- अच्छे लोगों से मित्रता का की कामना, गुरुजनों के प्रति नम्रता, विद्या और ज्ञान प्राप्ति में रुचि, स्त्री से प्रेम, लोकनिंदा से डर,भगवान शिव की भक्ति,अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण और दुष्ट लोगों की संगत का त्याग-यह सभी गुण सज्जन पुरुषों के प्रमाण है। ऐसे सज्जनों को प्रणाम।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आधुनिक युग में लोगों का न केवल नैतिक पतन हुआ है बल्कि उनके विचार करने की शक्ति का भी हृास हुआ है। सज्जन पुरुषों से मित्रता की बजाय लोग दादा टाईप लोगों के साथ मित्रता इस आशा से करते हैं कि वह भविष्य में उनको सुरक्षा प्रदान करेंगे। शांति से साधना करने वाले गुरुओं की बजाय पहुंच वाले गुरुओं की शरण लेते हैं । आम लोगों की इस प्रवृति ने समाज के हर क्षेत्र में दलाली को प्रोत्साहन दिया है। छल कपट से स्वयं को शक्तिशाली प्रमाणित करने वाले लोग समाज में सम्मान पा रहे हैं फिर यह कहना कि जमाना खराब हो गया है-बेकार का प्रलाप है। जिसे धन या सम्मान पाना है वह ‘बदनाम हुए तो क्या नाम तो है’ का नारा लगाते हुए ऐसे कामों में लग जाता है जो दो नंबर का होता है-जिसमें उसे दलाली मिलती है। लोकनिंदा का भय तो कदाचारी लोगों में कतई नहीं है। अब तो लोकनिंदा की कोई परवाह नहीं करता।

हम इसके लिये किसी एक व्यक्ति या समाज को उत्तरायी ठहरायें तो आत्ममंथन की प्रक्रिया से भागने जैसा होगा। हम लोग कहीं न कहीं अपनी निष्क्रियता से ऐसे दुष्ट लोगों को प्रोत्साहन दे रहे हैं जो विश्वसनीय और भरोसेमंद दिखते हैं पर होते नहीं हैं। समाज सेवा और जन कल्याण के नाम भ्रष्टाचार करने वालों की हम उपेक्षा करने की बजाय उनकी उपलब्धियों पर उनको बधाई देते हैं। उनके यहा आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेकर उनको अनुग्रहीत करते हैं। किसी को उसके कटु सत्यों का बयान करने का साहस नहीं होता। अगर हम चाहते हैं कि समाज शुरु रहे तो पहले हमें अपने अंदर शुद्धता का भाव लाना होगा जिसके लिय यह जरूरी है कि सज्जन लोगों से संपर्क करें और दुष्टों के प्रति उपेक्षा का भाव प्रदर्शित करें।
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Saturday, May 16, 2009

मनु स्मृति: लक्ष्य की सहजता से प्राप्ति अहिंसा से ही संभव

नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्।
न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।

हिंदी में भावार्थ-किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छा करने वालो को मांस के उपभोग का त्याग कर देना चाहिये।

यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।
तद्वाघ्नोत्ययत्नेन यो हिनस्तिन किंचन।।

हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता, वह जिस विषय पर एकाग्रता के साथ विचार और कर्म करता है वह अपना लक्ष्य शीघ्र और बिना विशेष प्रयत्न के प्राप्त कर लेता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में मनुष्य के चलने के दो ही मार्ग हैं-एक सत्य और परमार्थ और दूसरा असत्य और हिंसा। यदि मनुष्य का मन लोभ, लालच और अहंकार से ग्रस्त हो गया तो वह नकारात्मक मार्ग पर चलेगा और उसमें सहृदयता का भाव है तो वह सकारात्मक मार्ग पर चलता है। श्रीगीता के संदेशों का सार यह है कि जैसा मनुष्य अन्न जल ग्रहण करता है तो वैसा ही उसका स्वभाव हो जाता है तब वह उसी के अनुसार ही कर्म करता हुआ फल भोगता है।
वैसे पश्चिम के वैज्ञानिक भी अपने अनुसंधान से यह बात प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन और मांसाहारी भोजन करने वालों के स्वभाव में अंतर होता है। वह यह भी प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन करने वालों के विचार और चिंतन में सकारात्मक पक्ष अधिक रहता है जबकि मांसाहारी लोगों का स्वभाव इसके विपरीत होता है। अतः जितना संभव हो सके भोजन में मांसाहार से परहेज करना चाहिये।
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Friday, May 15, 2009

चाणक्य नीति: वन जल जाने पर मृग उसे त्याग देते हैं

ग्रहीत्वां दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्।
प्राप्तविद्यां गुरुं शिष्या दग्धाऽरण्यं मृगास्तथा।
हिंदी में भावार्थ-
ब्राह्मण दक्षिणा लेकर यजमान का घर छोड़ देते हैं। गुरु से शिक्षा प्राप्त कर शिष्य उसे दक्षिण देकर आश्रम से चले जाते हैं। उसी तरह जंगल जल जाने पर मृग उसका त्याग कर देते है।

दुराचारी च दुर्दृष्टिराऽवासी च दुर्जनः।
यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति।।

हिन्दी में भावार्थ-दुराचारी, कुदृष्टि रखने और बुरे स्थान पर रहने वाले व्यक्ति से संबंध बनाने पर श्रेष्ठ और सज्जन व्यक्ति शीघ्र नष्ट हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-संबंध बनाने में हमेशा सतर्कता बरतना चाहिये। देखा गया है कि आजकल के युवक युवतियां अक्सर संबंध तात्कालिक आकर्षण में फंसकर मित्रता ऐसे लोगों से कर बैठते हैं जिनके स्वभाव और इतिहास का पता उनको नहीं होता। बाद में जब वह उनकी वजह से कहीं फंस जाते हैं तब उनको अपनी गलती की अनुभूति होती है मगर तब देर भी हो जाती है। ऐसी एक नहीं अनेक घटनायें घटित हो चुकी हैं जिसमें किसी भले युवक ने किसी गलत साथी का चुनाव किया और बाद में उसके अपराध के छींटे उस पर भी पड़े। उसी तरह युवतियों ने भी प्रारंम्भिक आकर्षण में आकर ऐसे लड़कों से प्रेम प्रसंग स्थापित किये जिसका परिणाम उनके लिये घातक रहा। कई बार तो वह ऐसे युवकों से विवाह भी कर बैठती हैं जो दिखाने के लिये अपने संस्कर अच्छे दिखाते हैं पर बाद में उनकी असलियत सामने आती है तो युवतियों को पछतावा होता है। अनेक युवतियां पहले अपने घरेलू संस्कारों को भुलाकर ऐसे लड़कों से विवाह कर बैठती हैं जिनके घरेलू संस्कार बिल्कुल विपरीत होते हैं। विवाह से पहले तो उनके घर से लड़कियों का संबंध नहीं होता पर बाद विवाह बाद जब उसके परिवार वाले अपने संस्कार अपनाने को विवश करते हैं तब लड़कियों को बहुत परेशानी आती है और इसी बात पर सबसे अधिक तनाव उनको ही झेलना पड़ता है क्योंकि पुरुष तो घर से बाहर रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि लड़का हो या लड़की उसे अपने संबंध बनाने से पहले सामने वाले व्यक्ति की पूरी जांच करना चाहिये।

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि जब कहीं से अपना उद्देश्य पूरा हो जाये तो उस स्थान पर अधिक नहीं ठहरना चाहिये। कहने का तात्पर्य यह है कि इस जीवन में अपने कार्य और उद्देश्य पूर्ति के लिये अनेक स्थानों पर जाने के साथ ही लोगों से संपर्क भी बनाने पड़ते हैं। उनमें अपनी लिप्तता उतनी ही रहना चाहिये जितनी अपने हित के लिये आवश्यक हो। अधिक लिप्तता कार्य और उद्देश्य पर बुरा प्रभाव डाल सकती है।
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Wednesday, May 13, 2009

भर्तृहरि नीति शतक: पूजा को व्यापार के तरह न करें

मनु महाराज कहते हैं कि
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कि वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तजैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।
मुक्त्वैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानलं स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणिगवृत्तयं:।।


हिंदी में भावार्थ- वेद, स्मुतियों और पुराणों का पढ़ने और किसी स्वर्ग नाम के गांव में निवास पाने के लये कर्मकांडों को निर्वाह करने से भ्रम पैदा होता है। जो परमात्मा संसार के दुःख और तनाव से मुक्ति दिला सकता है उसका स्मरण और भजन करना ही एकमात्र उपाय है शेष तो मनुष्य की व्यापारी बुद्धि का परिचायक है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने जीवन यापन के लिये व्यापार करते हुए इतना व्यापारिक बुद्धि वाला हो जाता है कि वह भक्ति और भजन में भी सौदेबाजी करने लगता है और इसी कारण ही कर्मकांडों के मायाजाल में फंसता जाता है। कहा जाता है कि श्रीगीता चारों वेदों का सार संग्रह है और उसमें स्वर्ग में प्रीति उत्पन्न करने वाले वेद वाक्यों से दूर रहने का संदेश इसलिये ही दिया गया है कि लोग कर्मकांडों से लौकिक और परलौकिक सुख पाने के मोह में निष्काम भक्ति न भूल जायें।

वेद, पुराण और उपनिषद में विशाल ज्ञान संग्रह है और उनके अध्ययन करने से मतिभ्रम हो जाता है। यही कारण है कि सामान्य लोग अपने सांसरिक और परलौकिक हित के लिये एक नहीं अनेक उपाय करने लगते हंै। कथित ज्ञानी लोग उसकी कमजोर मानसिकता का लाभ उठाते हुए उससे अनेक प्रकार के यज्ञ और हवन कराने के साथ ही अपने लिये दान दक्षिणा वसूल करते हैं। दान के नाम किसी अन्य सुपात्र को देने की बजाय अपन ही हाथ उनके आगे बढ़ाते हैं। भक्त भी बौद्धिक भंवरजाल में फंसकर उनकी बात मानता चला जाता है। ऐसे कर्मकांडों का निर्वाह कर भक्त यह भ्रम पाल लेता है कि उसने अपना स्वर्ग के लिये टिकट आरक्षित करवा लिया।

यही कारण है कि कि सच्चे संत मनुष्य को निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करने के लिये प्रेरित करते हैं। भ्रमजाल में फंसकर की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत तनाव बढ़ता है। जब किसी यज्ञ या हवन से सांसरिक काम नहीं बनता तो मन में निराशा और क्रोध का भाव पैदा होता है जो कि शरीर के लिये हानिकारक होता है। जिस तरह किसी व्यापारी को हानि होने पर गुस्सा आता है वैसे ही भक्त को कर्मकांडों से लाभ नहीं होता तो उसका मन भक्ति और भजन से विरक्त हो जाता है। इसलिये भक्ति, भजन और साधना में वणिक बुद्धि का त्याग कर देना चाहिये।
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Monday, May 11, 2009

चाणक्य नीति:मनुष्य का क्रोध उसके नेत्रों से प्रकट होता है

अभ्यासाद्धर्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते।
गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अभ्यास से ज्ञान और गुण और शील से कुलप्रतिष्ठा प्राप्त हो जाती है। मनुष्य अपने गुणों से पहचाना जाता है और उसका क्रोध नेत्रों से प्रकट होता है।
निस्पृहो नाऽधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वंचकः।।

हिंदी में भावार्थ-अधिकारी कभी इच्छा और लोभ रहित, श्रृंगार का रसिक निष्काम, मूर्ख मधुरवाणी तथा स्पष्टवादी कभी धोखा देने वाला नहीं होता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जहां किसी व्यक्ति को कोई अधिकार मिला है वहां वह लोभ और कामना रहित नहीं हो सकता। कहते हैं न कि ‘घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या?‘ मनुष्य में अधिकार आने पर अहंकार आ ही जाता है। ऐसे विरले ही लोग होत हैं जो आत्मज्ञान से युक्त होने पर अधिकार आने पर पर लालची नहीं होते। सच बात तो यह है कि आदमी अपने कर्तव्य बोध से अधिक अपने अधिकार पर अहंकार करता है।
जहां मनुष्य अधिकारी है वहां इस बात को भूल जाता है कि उसका कर्तव्य क्या है? वह बस अधिकार की बात करता और सोचता है। अगर उसके साथ वह अपने कर्तव्य के निर्वहन का अभ्यास करे तो उसके अधिकार स्वतः बने रह सकते हैं पर इसके विपरीत वह बिना कर्तव्य के अधिकार चाहता है। इसी कारण वह अलोकप्रिय होता है। अपने कर्तव्य निर्वाह के अभ्यास करने पर जहां मनुष्य की लोक प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है और न करने पर वह अपयश का भागी बनता है। विश्व में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने लोक प्रतिष्ठा इसलिये अर्जित की क्योंकि उन्होंने अपने कर्तव्य निर्वहन का निरंतर अभ्यास किया। जहां केवल अपने लिये अधिकारों की लड़ाई होती है वहां लड़ाई झगड़े और वैमनस्य फैलता है। विश्व में जो हम इस समय तनाव का वातावरण देख रहे हैं उसका कारण यही है कि लोग अपने अधिकार की बात तो करते हैं पर कर्तव्य के विषय में खामोश हो जाते हैं। अगर अधिकारी अपने कर्तव्य निर्वहन के प्रति सजग हों तो ही परिवार, समाज और राष्ट्र में शांति रह सकती है।
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Wednesday, May 6, 2009

रहीम दास के दोहे:यह शरीर पृथ्वी का हर मौसम सहने में सक्षम

कविवर रहीम कहते हैं कि
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जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
धरती पर ही परत है, शीत घाम और मेह

कविवर रहीम कहते हैं कि इस मानव काया पर जैसी परिस्थिति आती है वैसा ही वह सहन भी करती है। इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु आती है और वह सहन करती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञों तमाम तरह के शोधों के बाद यह कह पाये कि हमारी देह बहुत लोचदार है उसमें हालतों से निपटने की बहुत क्षमता है। इसके लिये पता नहीं कितने मेंढकों और चूहों को काटा होगा-फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे । हमारे मनीषियों ने अपनी योग साधना और भक्ति से अर्जित ज्ञान से बहुत पहले यह जान लिया कि इस देह में बहुत शक्ति है और वह परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल लेती है। ज्ञान या तो योग साधना से प्राप्त होता है या भक्ति से। रहीम तो भक्ति के शिखर पुरुष थे और अपनी देह पर कतई ध्यान नहीं देते थे पर फिर भी उनको इस मनुष्य देह के बारे में यह ज्ञान हो गया पर आजकल अगर आप किसी सत्संग में जाकर बैठें तो लोग अपनी दैहिक तकलीफों की चर्चा करते हैं, और वहां ज्ञान कम आत्मप्रवंचना अधिक करते हैं। कोई कहेगा ‘मुझे मधुमेह हो गया है’ तो कोई कहेगा कि मुझे ‘उच्च रक्तचाप’ है। जिन संत लोगों का काम केवल अध्यात्मिक प्रवचन करना है वह उनकी चिकित्सा का ठेका भी लेते हैं। यह अज्ञान और भ्रम की चरम परकाष्ठा है।

मैने अपने संक्षिप्त योग साधना के अनुभव से यह सीखा है कि देह में भारी शक्ति होती है। मुझे योगसाधना का अधिक ज्ञान नहीं है पर उसमें मुझे अपने शरीर के सारे विकार दिखाई देते हैं तब जो लोग बहुत अधिक करते हैं उनको तो कितना अधिक ज्ञान होगा। पहले तो मैं दो घंटे योगसाधना करता था पर थोड़ा स्वस्थ होने और ब्लाग लिखने के बाद कुछ कम करता हूं (वह भी एक घंटे की होती है)तो भी सप्ताह में कम से कम दो बार तो पूरा करता हीं हूं। पहले मुझे अपना शरीर ऐसा लगता था कि मैं उसे ढो रहा हूं पर अब ऐसा लगता है कि हम दोनों साथ चलते हैं। मेरे जीवन का आत्मविश्वास इसी देह के लड़खड़ाने के कारण टूटा था आज मुझे आत्मविश्वास लगता है। आखिर ऐसा क्या हो गया?

इस देह को लेकर हम बहुत चिंतित रहते हैं। गर्मी, सर्दी और वर्षा से इसके त्रस्त होने की हम व्यर्थ ही आशंका करते हैं। सच तो यह है कि यह आशंकाएं ही फिर वैसी ही बीमारियां लातीं हैं। हम अपनी इस देह के बारे में यह मानकर चलें यह हम नहीं है बल्कि आत्मा है तो ही इसे समझ पायेंगे। इसलिये दैहिक तकलीफों की न तो चिंता करें और न ही लोगों से चर्चा करें। ऐसा नहीं है कि योगसाधना करने से आदमी कभी बीमार नहीं होता पर वह अपने आसनों से या घरेलू चिकित्सा से उसका हल कर लेता है। यह बात मैने अपने अनुभव से सीखी है और वही बता रहा हूं। योगसाधना कोई किसी कंपनी का प्राडक्ट नहीं है जो मैं बेच रहा हूं बल्कि अपना सत्य रहीम के दोहे के बहाने आपको बता रहा हूं।
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